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Tuesday, April 5, 2011

तुम्हारा कोट / रजनी अनुरागी




                                  


















फोटो: महेश बसेड़िया, होशंगाबाद


तुम्हारा कोट

तुम्हारे कोट को छुआ तो यूँ लगा
कि जैसे तुम हो उसके भीतर
उसके रोम-रोम में समाये
तुम्हारी ही गंध व्यापी थी उसमें
जो उसे छूते ही समा गई मुझमें
यूँ लगा कि जैसे तुमने छुआ हो मुझे
अचानक कहीं से आकर

मैं तो समझी थी कि तुम भूल गए हो मुझको
दिखा जब अंदर की जेब में लगा हरा पेन
एक मीठा सा अहसास हुआ
ये वही हरा पेन था
जो लिया था तुमने पहले मुझसे कभी

मगर अब वो पेन महज़ पेन नहीं रहा
वहाँ उग आया था एक हरा पत्ता
जो सीधे तुम्हारे दिल से जाके जुड़ता था
और तुम्हारा दिल अभी भी मुझसे जुड़ा है
मै अब भी हरे पत्ते-सी हरियाती हूँ तुम्हारे मन में
ये जानकर अच्छा लगा

ये जानकर अच्छा लगा
कि तुमने लगा के रखा है मुझको अभी भी सीने से
मैं अब भी वहाँ बसती हूँ
सघन हो गया प्रेम
आँख से आँसू बह निकले
तुमने सोख लिया फिर से मेरा दुख
सारा विषाद बह गया
रह गया तुम्हारा-मेरा प्रेम
हरे पत्ते सा तुम्हारे कोट में





रजनी अनुरागी

व्यापक मानवीय सरोकार नवोदित कवयित्री रजनी अनुरागी की कविताओं की केन्दीय भाव-भूमि है। सहज भाषा में गहन अभिव्यक्ति और स्पष्ट वैचारिकी उनके काव्य व्यक्तित्व की विशेषताएंहैं। उनकी कविताएं हिन्दी की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में छप चुकी हैं। वह दिल्ली विश्विद्यालय से हिन्दी साहित्य में पीएच-डी हैं और जानकी देवी मेमोरियल कालेज में पढ़ाती है।
ईमेल: anuragirajni@gmail.com