Total Pageviews

Showing posts with label ललित अहलूवालिया 'आतिश'. Show all posts
Showing posts with label ललित अहलूवालिया 'आतिश'. Show all posts

Friday, May 6, 2011

अंतिम प्रतिक्रिया


 photo by mukesh manas

       लगता था बरसेगा, लेकिन...,
बिना भिगोए गुज़र गया था !
वो बादल का टुकड़ा, यूं  ही...
बिना भिगोये गुज़र गया था !!
                 जाने कैसे तुम्हे पता था...

जब मेरे होठों की ख़्वाहिश...
सूखे  से  होठों  के  आगे...,
कुछ दूरी पर ठहर गयी थी !
और तुम्हारे थके हुए, बेजान...
उरोजों पर मेरी साँसे भारी थी ;
पल-पल मेरी प्रतिक्रिया कितनी चंचल थी !
मूक निमंत्रण सी उच्छ्वल थी ;
उस पल लगता था बरसेगा !

पर तुम जड़वत पड़ी पड़ी...
छत के पंखे पर लटका वो..,
मकड़ी का जाला देख रही थी !
और बादल का टुकड़ा यूं ही
बिना भिगोये गुज़र गया था !!
अनायास तुमने कह डाला...
"कब से छत पर धूल जमी है !"
अनायास मैंने कह डाला...
"छोड़ो अब कॉफ़ी ही ला दो !"

कुछ लमहे बीते, फिर जम कर...
कहीं दूर बिजली कड़की, और...
बिना भिगोये गुज़र गया था...,
वो बादल का टुकड़ा...,
जाने किसकी छत पर बरस पड़ा था !!
                जाने कैसे तुम्हे पता था...

तुमने मेरी पथराई आँखों को देखा,
पास  पड़ी झाड़ू  में अटके  मकड़ी  के जले को देखा !
छूट चला था हाथों से, उस कॉफ़ी के प्याले को देखा !
और फिर लम्बी सांस भरी, आंसू को पोंछा..., फोन  घुमाया !
            
               कैसे जाना तुमने
               मेरी अंतिम प्रतिक्रिया को...,
               बोलो कैसे जाना

तमाशा

हाथ पकड़ कर लाये हो...
तो गले लगा लो
मेरी ओर ज़रा मुह मोड़ो,
सीली दियासलाई  छोड़ो...
मेरी सिग्रेट से,
अपनी सिग्रेट सुलगा लो

चिंगारी से ले चिंगारी...
हवन करो कड़वाहट सारी,
चलो..,
सिलवटें माथे की
कुछ सीधी कर लो
फूलों की बगिया में
थोड़ा और विचर लो

होठों से, धूएँ में सिमटा...
शब्द-शब्द,
छल्लों में लिपटा...
आस्मान पर छा'ता जाए
अच्छा हो, 'गर...
बारिश बन बरसे दोनों पर,
हृदय-पीर सहलाता जाए

दियासलाई  सीली-सीली,
रगड़-रगड़ कर तीली-तीली
यूं मत खेलो
छोड़ो..,  सुनो;
मेरी सिग्रेट से ही दम ले लो

पर जूते से मसल ना देना;
फिर से कोई...
नया 'तमाशा' मत कर देना