सुखनवर
संज्ञान साहित्यिक सांस्कृतिक मंच का ब्लाग
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Tuesday, October 11, 2011
Friday, May 6, 2011
अंतिम प्रतिक्रिया
photo by mukesh manas
लगता था बरसेगा, लेकिन...,
बिना भिगोए गुज़र गया था !
वो बादल का टुकड़ा, यूं ही...
बिना भिगोये गुज़र गया था !!
जाने कैसे तुम्हे पता था...
जब मेरे होठों की ख़्वाहिश...
सूखे से होठों के आगे...,
कुछ दूरी पर ठहर गयी थी !
और तुम्हारे थके हुए, बेजान...
उरोजों पर मेरी साँसे भारी थी ;
पल-पल मेरी प्रतिक्रिया कितनी चंचल थी !
मूक निमंत्रण सी उच्छ्वल थी ;
उस पल लगता था बरसेगा !
पर तुम जड़वत पड़ी पड़ी...
छत के पंखे पर लटका वो..,
मकड़ी का जाला देख रही थी !
और बादल का टुकड़ा यूं ही
बिना भिगोये गुज़र गया था !!
अनायास तुमने कह डाला...
"कब से छत पर धूल जमी है !"
अनायास मैंने कह डाला...
"छोड़ो अब कॉफ़ी ही ला दो !"
कुछ लमहे बीते, फिर जम कर...
कहीं दूर बिजली कड़की, और...
बिना भिगोये गुज़र गया था...,
वो बादल का टुकड़ा...,
जाने किसकी छत पर बरस पड़ा था !!
जाने कैसे तुम्हे पता था...
तुमने मेरी पथराई आँखों को देखा,
पास पड़ी झाड़ू में अटके मकड़ी के जले को देखा !
छूट चला था हाथों से, उस कॉफ़ी के प्याले को देखा !
और फिर लम्बी सांस भरी, आंसू को पोंछा..., फोन घुमाया !
कैसे जाना तुमने
मेरी अंतिम प्रतिक्रिया को...,
बोलो कैसे जाना
तमाशा
हाथ पकड़ कर लाये हो...
तो गले लगा लो
मेरी ओर ज़रा मुह मोड़ो,
सीली दियासलाई छोड़ो...
मेरी सिग्रेट से,
अपनी सिग्रेट सुलगा लो
चिंगारी से ले चिंगारी...
हवन करो कड़वाहट सारी,
चलो..,
सिलवटें माथे की
कुछ सीधी कर लो
फूलों की बगिया में
थोड़ा और विचर लो
होठों से, धूएँ में सिमटा...
शब्द-शब्द,
छल्लों में लिपटा...
आस्मान पर छा'ता जाए
अच्छा हो, 'गर...
बारिश बन बरसे दोनों पर,
हृदय-पीर सहलाता जाए
दियासलाई सीली-सीली,
रगड़-रगड़ कर तीली-तीली
यूं मत खेलो
छोड़ो.., सुनो;
मेरी सिग्रेट से ही दम ले लो
पर जूते से मसल ना देना;
फिर से कोई...
नया 'तमाशा' मत कर देना
Wednesday, May 4, 2011
याद
रेणु हुसैन
31 दिसम्बर 1970 को हरियाणा के सोनीपत जिले में जन्म। दिल्ली सरकार के विद्यालय में अंग्रेजी की अध्यापिका। कविताओं की पहली किताब पानी-प्यार प्रकाशित। हिन्दी की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में कविताएं प्रकाशित। ईमेल: renuhussain@gmail.com फ़ोन: 09811499786
Photo by Vandna
याद तुम्हारी जब आती है
झील-सी ठहरी इन आंखों में
कितनी लहरें पड़ जाती हैं
दूर कहीं आकाश में ठहरी
सब बदलियां बरस जाती हैं
बंजर-सी सूखी धरती पर
चाहत की कितनी ही कलियां
खिल जाती हैं
याद तुम्हारी जब आती है
दिल की धड़कन बढ़ जाती है
तन्हाई हो जाती रौशन
बेचैंनी मिट जाती है
औ’ सांसों में महक तुम्हारी
मुझे चूमती देर तलक
नींद मुझे फिर कब आती है
याद तुम्हारी जब आती है
Friday, April 8, 2011
मैंने तुम्हें चाहा अविराम / रेणु हुसैन
painting by Apoorva Manas
मैंने तुम्हें चाहा अविराम
मैंने तुम्हें चाहा अविराम
और तुम्हें पाने की कामना न की
न साथ फेरे लिए, न माथे पे सिंदूर सजाया
न ही तुम्हारे नाम की मेंहदी रचाई
न ख्वाब ही देखे तुम्हारे संग हम ख्वाब होने के
न चाहा तुमसे बतियाना, न संग एक निवाला खाना
मगर मैंने तुम्हें चाहा अविराम
प्रेम का एक बीज था मेरे भीतर जाने कबसे
अनजान थी मैं जिससे
तुमने मुझे उर्वर किया
रौशनी दी, हवा दी,पानी दिया,
जीवन दिया तुमने मुझे
तुम्हें पाकर आज घना वृक्ष बन गया है
प्रेम का वो बीज
लो प्रिये लो मेरा प्यार लो
लौटा रही हूँ मैं तुम्हें अब वृक्ष ये
इस घने वृक्ष की छाया
मजबूत शाखें और शाखों पर घोंसले
घोंसलों में व्याप्त चिड़ियों की चहचहाहट के साथ……
ईष्ट देव हो मेरे तुम, मैं तुम्हारी अर्चना हूँ
गूँजेगा मेरा ही प्रेम मंत्रोच्चार
इस स्थूल, अचल, पाथर जगत में
आवाज़ें फ़ना होने पर भी
मौंन की खनखनाहट रहेगी व्याप्त
इस धरा पर प्यार को मेरे समाये ……
तुम धरती के प्रथम पुरूष हो
मैं हूँ पहली नारी
प्रेम की फुहारों में बौराई, जो मदमाई
स्वामिनी बन मन ही मन हर्षाई
हां ज्ञात है मुझको यही
कि तुम हो मेरे प्रेम केवल
मगर तुम मेरे नहीं हो
मुझे है सहर्ष ये स्वीकार
तुम्हारा बारहों मासी इंतज़ार
मैं हूँ चातक अब तुम्हारी
सावन की पहली बूँद की प्यासी
सौंधी-सौंधी गोधूलि या स्वर्णिम कनक की बाली
मुझे ग्रहीत है तुम्हारी हर बात
कैसे उखाड़ दूँ अपने प्रेम-पौध की जड़ें
जो भी तुम दो प्राप्य है मुझको वही
मैं पथिक हूँ, प्रेम है रस्ता मेरा
प्रेम मेरा कारोबार हो गया है
और तुमसे बंध गई निर्बन्ध मैं
तुम्हें नहीं रखा है अपने प्रेम जाल में
नेह तागों से बाँध कर
मैं स्वयं साम्राज्ञी हूँ अपने प्रेम जगत की
और तुम आज़ाद हो, निर्लिप्त हो मुझसे सुनो
तुम अँजुली हो और मुट्ठी से फिसलती रेत भी
फूल हो तुम और खुशबू की तरह वायु में सर्वत्र भी
विस्तीर्ण नभ हो और समुद की गहराई भी
इंद्रधनुष के सात रंग और इंद्रधनुष का वक्र भी
तुम स्वयं ही प्रेम हो और प्रेम का हो स्रोत भी
आसक्त हूँ मैं तुम्हारी संपूर्णता पर
और बह रही हूँ मैं श्वास की भाँती चल-अचल में
और प्रेम नदियों सा, दरियाओं सा,
समंदरों के पानी सा और पानी में नमक सा
अपने संपूर्ण सत्य और सौंदर्य के साथ
रहेगा व्याप्त जीवन की तरह
भीनी ओस हरीतिमा लिए
धूप के अंश और चाँद की शीतलता लिये
रहेगा व्याप्त
सदैव सदैव
रेणु हुसैन
31 दिसम्बर 1970 को हरियाणा के सोनीपत जिले में जन्म। दिल्ली सरकार के विद्यालय में अंग्रेजी की अध्यापिका। कविताओं की पहली किताब पानी-प्यार प्रकाशित। हिन्दी की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में कविताएं प्रकाशित।
ईमेल: renuhussain@gmail.com फ़ोन: 09811499786
Tuesday, April 5, 2011
तुम्हारा कोट / रजनी अनुरागी
फोटो: महेश बसेड़िया, होशंगाबाद
तुम्हारा कोट
तुम्हारे कोट को छुआ तो यूँ लगा
कि जैसे तुम हो उसके भीतर
उसके रोम-रोम में समाये
तुम्हारी ही गंध व्यापी थी उसमें
जो उसे छूते ही समा गई मुझमें
यूँ लगा कि जैसे तुमने छुआ हो मुझे
अचानक कहीं से आकर
मैं तो समझी थी कि तुम भूल गए हो मुझको
दिखा जब अंदर की जेब में लगा हरा पेन
एक मीठा सा अहसास हुआ
ये वही हरा पेन था
जो लिया था तुमने पहले मुझसे कभी
मगर अब वो पेन महज़ पेन नहीं रहा
वहाँ उग आया था एक हरा पत्ता
जो सीधे तुम्हारे दिल से जाके जुड़ता था
और तुम्हारा दिल अभी भी मुझसे जुड़ा है
मै अब भी हरे पत्ते-सी हरियाती हूँ तुम्हारे मन में
ये जानकर अच्छा लगा
ये जानकर अच्छा लगा
कि तुमने लगा के रखा है मुझको अभी भी सीने से
मैं अब भी वहाँ बसती हूँ
सघन हो गया प्रेम
आँख से आँसू बह निकले
तुमने सोख लिया फिर से मेरा दुख
सारा विषाद बह गया
रह गया तुम्हारा-मेरा प्रेम
व्यापक मानवीय सरोकार नवोदित कवयित्री रजनी अनुरागी की कविताओं की केन्दीय भाव-भूमि है। सहज भाषा में गहन अभिव्यक्ति और स्पष्ट वैचारिकी उनके काव्य व्यक्तित्व की विशेषताएंहैं। उनकी कविताएं हिन्दी की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में छप चुकी हैं। वह दिल्ली विश्विद्यालय से हिन्दी साहित्य में पीएच-डी हैं और जानकी देवी मेमोरियल कालेज में पढ़ाती है।
ईमेल: anuragirajni@gmail.com
Monday, April 4, 2011
शिविर एक दिन ख़ाली हो गया / मिथिलेश श्रीवास्तव
मिथिलेश श्रीवास्तव
25 जनवरी 1958 को गोपाल गंज बिहार में जन्म्। पटना विश्वविद्यालय से भौतिकी शास्त्र में आनर्स। दिल्ली में सरकारी नौकरी। लगभग सभी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में कविताएं छप चुकी हैं। पहला कविता संग्रह किसी उम्मीद की तरह बहुचर्चित। हिन्दी अकादमी के युवा कवि पुरस्कार से सम्मानित।
ईमेल: mithil_shri1@yahoo.co.in
फ़ोन: 9968628602
ईमेल: mithil_shri1@yahoo.co.in
फ़ोन: 9968628602
उन दिनों मैं लोगों के पते एक डायरी में लिखने लगा
एक डायरी में एक जगह ऐसे लोगों के पते
जो एक जगह रहते नहीं थे
वे एक जगह कभी इकट्ठा होते भी तो
फिर धीरे-धीरे सुस्त कदमों से लौटने लगते
इसलिए उनकी अपनी कोई सामूहिक पहचान नहीं बन सकी
वे हर जगह परास्त हो जाते
एक जगह उनके पते लिखकर उन्हें सामूहिक एहसास देने की
कोशिश की
एक जगह पते लिखकर मैंने उन्हें एक साथ याद किया
एक दिन डायरी के पन्ने जिनमें मैंने उनके पते लिखे थे
एक कब्रगाह की तरह लगने लगे
जैसे इतने सारे लोग एक साथ दफना दिये गये हों
जैसे कोई दुर्घटना मेरी डायरी के पन्नों में ही हुई हो
जैसे कोई आग मेरी डायरी के पन्नों में ही लगी हो
पुलिस इन्हीं पतों को ढूंढ़ती हुई आयी हो
जैसे लोग पुलिस और आग से बचते हुए
मेरी डायरी के पन्नों में शरणागत हो गये हैं
डायरी एक शरणार्थी शिविर में बदल गयी
मैं उन्हें जलपान देता वे जलपान करते
मैं उन्हें भोजन देता वे भोजन करते
मैं कहता बसने जाना है तो वे बसने चले जाते
मैं डायरी के पन्ने खोलता वे टहलने लगते
धीरे-धीरे शिविर खाली हो गया
उस दिन मुझे लगा मैं कहां जाऊं
अपनी डायरी के पन्नों में मुझे बोरियत होने लगी थी
दूसरों की डायरियों में
मेरे लिए जगह ही नहीं बची थी।
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