photo by mukesh manas
लगता था बरसेगा, लेकिन...,
बिना भिगोए गुज़र गया था !
वो बादल का टुकड़ा, यूं ही...
बिना भिगोये गुज़र गया था !!
जाने कैसे तुम्हे पता था...
जब मेरे होठों की ख़्वाहिश...
सूखे से होठों के आगे...,
कुछ दूरी पर ठहर गयी थी !
और तुम्हारे थके हुए, बेजान...
उरोजों पर मेरी साँसे भारी थी ;
पल-पल मेरी प्रतिक्रिया कितनी चंचल थी !
मूक निमंत्रण सी उच्छ्वल थी ;
उस पल लगता था बरसेगा !
पर तुम जड़वत पड़ी पड़ी...
छत के पंखे पर लटका वो..,
मकड़ी का जाला देख रही थी !
और बादल का टुकड़ा यूं ही
बिना भिगोये गुज़र गया था !!
अनायास तुमने कह डाला...
"कब से छत पर धूल जमी है !"
अनायास मैंने कह डाला...
"छोड़ो अब कॉफ़ी ही ला दो !"
कुछ लमहे बीते, फिर जम कर...
कहीं दूर बिजली कड़की, और...
बिना भिगोये गुज़र गया था...,
वो बादल का टुकड़ा...,
जाने किसकी छत पर बरस पड़ा था !!
जाने कैसे तुम्हे पता था...
तुमने मेरी पथराई आँखों को देखा,
पास पड़ी झाड़ू में अटके मकड़ी के जले को देखा !
छूट चला था हाथों से, उस कॉफ़ी के प्याले को देखा !
और फिर लम्बी सांस भरी, आंसू को पोंछा..., फोन घुमाया !
कैसे जाना तुमने
मेरी अंतिम प्रतिक्रिया को...,
बोलो कैसे जाना

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