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Friday, April 8, 2011

मैंने तुम्हें चाहा अविराम / रेणु हुसैन





painting by Apoorva Manas



 
मैंने तुम्हें चाहा अविराम


मैंने तुम्हें चाहा अविराम
और तुम्हें पाने की कामना न की
न साथ फेरे लिए, न माथे पे सिंदूर सजाया
न ही तुम्हारे नाम की मेंहदी रचाई
न ख्वाब ही देखे तुम्हारे संग हम ख्वाब होने के
न चाहा तुमसे बतियाना, न संग एक निवाला खाना
मगर मैंने तुम्हें चाहा अविराम

प्रेम का एक बीज था मेरे भीतर जाने कबसे
अनजान थी मैं जिससे
तुमने मुझे उर्वर किया
रौशनी दी, हवा दी,पानी दिया,
जीवन दिया तुमने मुझे

तुम्हें पाकर आज घना वृक्ष बन गया है
प्रेम का वो बीज
लो प्रिये लो मेरा प्यार लो
लौटा रही हूँ मैं तुम्हें अब वृक्ष ये
इस घने वृक्ष की छाया
मजबूत शाखें और शाखों पर घोंसले
घोंसलों में व्याप्त चिड़ियों की चहचहाहट के साथ……

ईष्ट देव हो मेरे तुम, मैं तुम्हारी अर्चना हूँ
गूँजेगा मेरा ही प्रेम मंत्रोच्चार
इस स्थूल, अचल, पाथर जगत में
आवाज़ें फ़ना होने पर भी
मौंन की खनखनाहट रहेगी व्याप्त
इस धरा पर प्यार को मेरे समाये ……

तुम धरती के प्रथम पुरूष हो
मैं हूँ पहली नारी
प्रेम की फुहारों में बौराई, जो मदमाई
स्वामिनी बन मन ही मन हर्षाई

हां ज्ञात है मुझको यही
कि तुम हो मेरे प्रेम केवल
मगर तुम  मेरे नहीं हो
मुझे है सहर्ष ये स्वीकार
तुम्हारा बारहों मासी इंतज़ार

मैं हूँ चातक अब तुम्हारी
सावन की पहली बूँद की प्यासी
सौंधी-सौंधी गोधूलि या स्वर्णिम कनक की बाली
मुझे ग्रहीत है तुम्हारी हर बात
कैसे उखाड़ दूँ अपने प्रेम-पौध की जड़ें
जो भी तुम दो प्राप्य है मुझको वही

मैं पथिक हूँ, प्रेम है रस्ता मेरा
प्रेम मेरा कारोबार हो गया है
और तुमसे बंध गई निर्बन्ध मैं

तुम्हें नहीं रखा है अपने प्रेम जाल में
नेह तागों से बाँध कर
मैं स्वयं साम्राज्ञी हूँ अपने प्रेम जगत की
और तुम आज़ाद हो, निर्लिप्त हो मुझसे सुनो

तुम अँजुली हो और मुट्ठी से फिसलती रेत भी
फूल हो तुम और खुशबू की तरह वायु में सर्वत्र भी
विस्तीर्ण नभ हो और समुद की गहराई भी
इंद्रधनुष के सात रंग और इंद्रधनुष का वक्र भी

तुम स्वयं ही प्रेम हो और प्रेम का हो स्रोत भी
आसक्त हूँ मैं तुम्हारी संपूर्णता पर
और बह रही हूँ मैं श्वास की भाँती चल-अचल में
और प्रेम नदियों सा, दरियाओं सा,
समंदरों के पानी सा और पानी में नमक सा
अपने संपूर्ण सत्य और सौंदर्य के साथ
रहेगा व्याप्त जीवन की तरह
भीनी ओस हरीतिमा लिए
धूप के अंश और चाँद की शीतलता लिये
रहेगा व्याप्त
सदैव सदैव





रेणु हुसैन
31 दिसम्बर 1970 को हरियाणा के सोनीपत जिले में जन्म। दिल्ली सरकार के विद्यालय में अंग्रेजी की अध्यापिका। कविताओं की पहली किताब पानी-प्यार  प्रकाशित। हिन्दी की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में कविताएं प्रकाशित।
ईमेल: renuhussain@gmail.com  फ़ोन: 09811499786






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