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Monday, April 4, 2011

तुम्हारा आना / गोबिन्द प्रसाद


 






















चित्र:खुशी उम्र: दो साल


तुम्हारा आना

तुम्हारा आना
जैसे खुली आँखों का सपना
तुम्हारा आना
जैसे दिए में लौ का जल उठना
तुम्हारा आना
सूने आसमान में उगता हो जैसे
धीरे से तारा
तुम्हारा आना
दौड़ता हो जैसे
रगों में पारा
तुम्हारा आना
जैसे घिसटते हुए पाँव की पुलक
मक़बरों के आस-पास
ढलते हुए सूरज की रमक़
तुम्हारा आना
जैसे रात के सन्नाटे में कोई शहर
तुम्हारा आना
साँस लेता हो जैसे कोई वीरान खंडहर।






गोबिन्द प्रसाद
26 अगस्त 1955 बाज़ार सीताराम दिल्ली में जन्म। हिन्दी साहित्य में पीएच-डी तथा भारतीय भाषा केन्द्र जे एन यू में प्रोफ़ेसर। दो कविता सग्रह कोई ऐसा शब्द दो और मैं नहीं था लिखते समय दो आलोचना पुस्तकें कविता के सम्मुख और त्रिलोचन के बारे में प्रकाशित। फारसी-हिन्दी कोष का निर्माण और फ़िराक़ गोरखपुरी बहुचर्चित कृति उर्दू की इश्किया शायरी का देवनागरी में लिप्यंतरण।
ईमेल: gobindprasad8@gmail.com फोन : 91 99999428212



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