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Monday, April 4, 2011

शिविर एक दिन ख़ाली हो गया / मिथिलेश श्रीवास्तव

मिथिलेश श्रीवास्तव
25 जनवरी 1958 को गोपाल गंज बिहार में जन्म्। पटना विश्वविद्यालय से भौतिकी शास्त्र में आनर्स। दिल्ली में सरकारी नौकरी। लगभग सभी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में कविताएं छप चुकी हैं। पहला कविता संग्रह किसी उम्मीद की तरह  बहुचर्चित। हिन्दी अकादमी के युवा कवि पुरस्कार से सम्मानित।
ईमेल: mithil_shri1@yahoo.co.in                               
फ़ोन: 9968628602



                                        
                                          painting by Apoorva Manas

शिविर एक दिन ख़ाली हो गया

उन दिनों मैं लोगों के पते एक डायरी में लिखने लगा
एक डायरी में एक जगह ऐसे लोगों के पते
जो एक जगह रहते नहीं थे
वे एक जगह कभी इकट्ठा होते भी तो
फिर धीरे-धीरे सुस्त कदमों से लौटने लगते
इसलिए उनकी अपनी कोई सामूहिक पहचान नहीं बन सकी
वे हर जगह परास्त हो जाते
एक जगह उनके पते लिखकर उन्हें सामूहिक एहसास देने की
कोशिश की

एक जगह पते लिखकर मैंने उन्हें एक साथ याद किया
एक दिन डायरी के पन्ने जिनमें मैंने उनके पते लिखे थे
एक कब्रगाह की तरह लगने लगे
जैसे इतने सारे लोग एक साथ दफना दिये गये हों
जैसे कोई दुर्घटना मेरी डायरी के पन्नों में ही हुई हो
जैसे कोई आग मेरी डायरी के पन्नों में ही लगी हो
पुलिस इन्हीं पतों को ढूंढ़ती हुई आयी हो
जैसे लोग पुलिस और आग से बचते हुए
मेरी डायरी के पन्नों में शरणागत हो गये हैं

डायरी एक शरणार्थी शिविर में बदल गयी
मैं उन्हें जलपान देता वे जलपान करते
मैं उन्हें भोजन देता वे भोजन करते
मैं कहता बसने जाना है तो वे बसने चले जाते
मैं डायरी के पन्ने खोलता वे टहलने लगते

धीरे-धीरे शिविर खाली हो गया
उस दिन मुझे लगा मैं कहां जाऊं
अपनी डायरी के पन्नों में मुझे बोरियत होने लगी थी
दूसरों की डायरियों में
मेरे लिए जगह ही नहीं बची थी।


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